जीवनछंद’ : संवेदना, सत्य और व्यक्तित्व की काव्य-यात्रा
जीवनछंद मात्र एक काव्य-संकलन नहीं, बल्कि कवि-हृदय की उन तरंगों का सजीव दस्तावेज़ है, जो समय-समय पर अनुभव, चिंतन और संवेदना के रूप में शब्दों में ढलती रही हैं। इस संग्रह में जहाँ एक ओर समसामयिक जीवन की जटिलताओं और प्रश्नों की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
पुस्तक की भूमिका अमर कुमार सिंह, पूर्व निदेशक, बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा लिखी गई है, जो इसकी साहित्यिक गरिमा को और भी ऊँचा उठाती है। वे लिखते हैं कि—
“कलानाथ मिश्र अपनी कविताओं में रागात्मक संवेदना के माध्यम से ‘व्यक्तित्व की खोज’ करते हैं। यह खोज व्यक्ति को सामाजिक असंगतियों के आघात सहते हुए भी अडिग रहने, अपने दायित्व को समझने और उसे केवल व्यक्तिगत हित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक कल्याण के लिए पूर्ण करने की प्रेरणा देती है।”
डॉ. कलानाथ मिश्र की कविताएँ रागात्मकता से परिपूर्ण होते हुए भी स्वच्छंदतावादी या मात्र रोमांटिक नहीं हैं; वे यथार्थ की ठोस धरातल से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि जीवनछंद पाठक को केवल सौंदर्य-बोध ही नहीं, बल्कि जीवन-बोध भी प्रदान करता है—एक ऐसा बोध, जो भीतर से जगाता है और आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
हिन्दी उपन्यास में साहित्यकारों का चरित्र-विधान
यह एक आलोचनात्मक पुस्तक है जिसमें साहित्यकारों के जीवनवृत पर लिखे गए हिन्दी उपन्यासों का मूल्यांकन किया गया है। इस मूल्यांकन के लिए आलोचक कलानाथ मिश्र ने कालिदास की आत्मकथा, बाणभट्ट की आत्मकथा, हरार्दर्पण, लखिमा की आँखें, लोई का ताना, रत्ना की बात, भारती का सपूत, मेरी भव बाध हरो, मानस का हंस, खंजन नयन नामक उपन्यासों को लिया है। इन उपन्यासों में से प्रथम तीन संस्कृत रचनाकारों के जीवनवृत पर आधरित हैं। शेष हिंदी के रचनाकारों के जीवन पर। इस आलोचनात्मक ग्रंथ में लेखक ने उपन्यासों के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य एवं औपन्यासिक कल्पना की पड़ताल की है। साथ ही उनमें लेखक की संवेदनाओं की गहराई को भी परखने एवं विश्लेषित करने का प्रयास किया है। इस पुस्तक से हमें डॉ. कलानाथ मिश्र की सूक्ष्म आलोचनात्मक दृष्टि एवं गहन वैचारिकता का प्रमाण मिलता है। यह पुस्तक इसलिए भी उपादेय हो जाती है क्योंकि इसमें साहित्यकारों के जीवन पर लिखे गए सभी उपन्यासों को एक कलेवर में प्रस्तुत कर उनके गुण-दोषों की विवेचना की गई है। साहित्य के अध्येताओं के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है।
हिंदी उपन्यासों में संस्कृत रचनाकारों का जीवनवृत
यह भी एक आलोचनात्मक पुस्तक है जिसमें संस्कृत के कवियों के जीवनवृत पर आधरित हिंदी उपन्यासों की आलोचना प्रस्तुत की गई है। संस्कृत के तीन महाकवियों कालिदास, बाणभट्ट एवं कल्हण पर हिंदी में क्रमशः तीन उपन्यास लिखे गए हैं-कालिदास की आत्मकथा, बाणभट्ट की आत्मकथा एवं हरादर्पण। इन उपन्यासों की चर्चा आलोचक ने उपर्युक्त ग्रंथ में भी की है परंतु ये उपन्यास अपने विषयवस्तु की गहनता के कारण अलग से विस्तृत समीक्षा की अपेक्षा रखते हैं। यही कारण है कि लेखक ने इन उपन्यासों की आलोचना प्रस्तुत पुस्तक में विस्तार से की है। इसमें आलोचक ने इन उपन्यासों की कथा की प्रामाणिता एवं उनके स्रोतों पर विचार करते हुए संस्कृत के इन कवियों एवं उपन्यास में वर्णित उनके जीवन के बीच के अंतर को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इनमें आलोचक ने उपन्यासों के रचना-विधन एवं उनकी भाषा पर भी अपना विचार व्यक्त किया है। इन तीनों उपन्यासों के प्रति उत्सुकता उत्पन्न करने एवं उन्हें ठीक से समझने में यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
दो कमरे का मन
‘दो कमरे का मन’ एक कहानी संग्रह है। इसमें ग्यारह कहानियों को संकलित किया गया है। इन कहानियों में लेखक ने रोजमर्रा के जीवन में गुजरने वाली विभिन्न घटनाओं को अपनी संवेदनापूर्ण दृष्टि से देखने का प्रयास किया है। इन कहानियों में यद्यपि अलग-अलग घटनाक्रम को दर्शाया गया है किंतु संवेदना के स्तर पर सभी कहानियों में आंतरिक अभिन्नता दृष्टिगोचर होती है। सभी कहानियों में परिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में हो रहे विघटन पर चिंता व्यक्त की गई है। संवेदनात्मक स्तर की यह अभिन्नता कहानी संग्रह को सार्थक भी बनाती है क्योंकि यह संग्रह एक ही मूड की कहानियों को एक साथ परोसने का उपक्रम करता है। इन कहानियों में पाठकों को मूल्यहीनता के कई स्तर और रंग देखने को मिल जाते हैं। यह मूल्यहीनता आज मित्र को मित्र से अलग, पिता को पुत्र से अलग करने और सारी आत्मीयता को औपचारिकता में बदलने पर तुली हुई है।
आवारा मसीहा की औपन्यासिकता
यह आलोचनात्मक कृति बड़ी ही रोचकता के साथ लिखी गई है, जिसे पढ़ते हुए कहीं भी आलोचना पढ़ने जैसा नीरज प्रभाव मस्तिष्क ग्रहण नहीं करता है, एक रचनात्मक साहित्य पढ़ने जैसी रसात्मक अनुभूति होती है। इस पुस्तक में विष्णु प्रभाकर के द्वारा लिखे गए, महान साहित्यकार ‘शरतचंद’ की जीवनी ‘आवारा मसीहा, पर विमर्श किया है। वैसे तो इस पुस्तक में अनेक संदर्भ उद्घाटित हैं लेकिन इस पुस्तक का मूल ध्येय यह देखना है कि विष्णु प्रभाकर ने ‘आवारा मसीहा’ में औपन्यासिक तत्वों का प्रयोग किस हद तक और किस रूप में किया है।
संपूर्ण पुस्तक में कई संदर्भों के माध्यम से आवारा मसीहा के औपन्यासिक तत्वों पर विमर्श किया गया है। हाँ, यह कहना एकांगी होगा कि इसमें सिर्फ आवारा मसीहा के औपन्यासिक तत्वों पर विमर्श किया गया है। इस बहाने, जीवनी और जीवनीपरक उपन्यास के संपूर्ण तत्वों पर बात की गई है। ‘आवारा मसीहा’ के चरित्रों का चारित्रिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। प्रेम-प्रसंगों को बारीकी से उद्घाटित किया गया है। इस रचना में विष्णु प्रभाकर की जीवन दृष्टि को रेखांकित करने के साथ शरत्-चंद्र के क्रांतिकारी विचारों को भी उद्घाटित किया गया है। शरत्-साहित्य पर संपूर्ण प्रतिक्रिया को रेखांकित करते हुए पुस्तक के प्रभाव, वर्णन-कौशल आदि पर भी विस्तारपूर्वक विमर्श किया गया है।यह एक आलोचनात्मक ग्रंथ है जिसमें विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित शरत्चंद्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ की समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इस ग्रंथ की आलोचना के क्रम में डॉ. कलानाथ मिश्र ने जीवनी और उपन्यास के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए आवारा मसीहा में जीवनी एवं औपन्यासिक तत्व का अन्वेषण किया है। उन्होंने जीवनी की प्रामाणिकता और अप्रामाणिकता की खोज करते हुए उसके उन स्रोतों की वैधता एवं अवैधता पर भी अपना विचार व्यक्त किया है जिनसे इस जीवनी का तानाबाना बुना गया है। आलोचना के क्रम में आलोचक ने जीवनी के विविध मार्मिक प्रसंगों का उद्धरण भी प्रस्तुत किया है जो मूल पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित तो करता ही है साथ ही उन प्रसंगों के मर्म को समझाने में भी सहायक सिद्ध होता है।
याद रखना इस पथिक को
‘याद रखना इस पथिक को’ मिथिला के सामान्य परिवार में जन्मी तथा अनंत संघर्षों के बाद एक सफल चिकित्सक के रूप में अप्रतिम ख्याति अर्जित करनेवाली महिला श्रीमती जगदीश्वरी मिश्र की जीवनी है। श्रीमती मिश्र के जीवनवृत को डॉ. कलानाथ मिश्र ने बड़ी संवेदना एवं कलात्मकता के साथ एक जीवनी का रूप तथा कथात्मक तारतम्य प्रदान किया है। इस पुस्तक में जगदीश्वरी मिश्र के जन्म, शिक्षा-दीक्षा, डाक्टरी पढ़ने एवं प्रैक्टिस करने, पारिवारिक दायित्वों के निर्वाह, जीवन के उतार-चढ़ाव आदि का बड़ी सूक्ष्मता एवं मार्मिकता के साथ वर्णन किया गया है। इसमें श्रीमती मिश्र के जीवन की उपलब्ध्यिों के साथ-साथ जीवन के उत्तरार्द्ध में उनकी वैध्व्य की पीड़ा को भी उकेरने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में श्रीमती मिश्र के जीवन के विभिन्न अवसरों एवं गतिविधियों से जुड़ी तस्वीरों को भी प्रस्तुत किया गया है। कुल मिलाकर यह जीवनी एक सामान्य घर में जन्मी नारी के संघर्ष की कहानी है जो सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। इसे पढ़कर निश्चय ही महिलाओं को, खासकर सामान्य महिलाओं को आगे बढ़ने एवं जीवन की विसंगतियों से लड़ने की प्रेरणा मिलेगी।
'आचार्य शिवपूजन सहाय : संघर्ष और सृजन'
आचार्य शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व और कृतित्व को जानने के लिए उपलब्ध महत्वपूर्ण पुस्तकों में प्रो. कलानाथ मिश्र द्वारा संपादित पुस्तक ‘आचार्य शिवपूजन सहाय : संघर्ष और सृजन’ रेखांकित करने योग्य है। प्रो. कलानाथ मिश्र के द्वारा संपादित इस पुस्तक का पहला संस्करण वर्ष 2024 के शुरुआती महीने में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आचार्य शिवपूजन सहाय की रचनाओं के विभिन्न पक्षों पर विमर्श प्रस्तुत किया गया है। एक ओर आचार्य शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व पर स्वयं उनके पुत्र श्री मंगलमूर्ति जी ने प्रकाश डाला है तो वहीं दूसरी ओर डॉक्टर रामदरश मिश्र, भारत यायावर, भृगुनंदन त्रिपाठी, डॉ. राम सिंहासन सिंह सदृश्य हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों ने आचार्य शिवपूजन सहाय की रचनाधर्मिता और व्यक्तित्व पर विमर्श किया है। आचार्य शिवपूजन सहाय के पुत्र श्री मंगलमूर्ति जी के साथ प्रोफ़ेसर कलानाथ मिश्र ने एक अंतरंग साक्षात्कार भी किया है, जो आचार्य शिवपूजन सहायक के विविध पक्षों को उद्घाटित करता है। यह साक्षात्कार भी इस पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। आचार्य शिवपूजन सहाय ने विवाह के पूर्व अपनी भावी पत्नी को जो पत्र लिखा था वह भी श्री मंगलमूर्ति जी के सौजन्य से डॉ. कलानाथ मिश्र ने प्राप्त किया और इस पुस्तक में प्रकाशित किया है। यह पत्र आचार्य शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व और भाषिक कौशल का उत्कृष्ट नमूना पेश करता है। पुस्तक में एक अध्याय रखा गया है ‘स्मृति के आईने में शिवपूजन सहाय’ इस अध्याय में राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, जवाहरलाल चतुर्वेदी, रामचंद्र वर्मा, छविनाथ पांडे, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जैसे अपने समय के शीर्ष साहित्यकारों के विचार प्रकाशित किए गए हैं, जो उन्होंने अलग-अलग समय में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर लिखे थे। ढाई दर्जन के करीब लेखों को महत्वपूर्ण रूप से समेटे हुए यह पुस्तक आचार्य शिवपूजन सहाय के जीवन और उनकी सृजनधर्मिता को संपूर्णता में उजागर करती है।
'सृजन के प्रतिमान'
लोक-जीवन एवं सामाजिक-धार्मिक क्रिया-कलापों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पर्यावरण के संरक्षण पर बल दिया गया। इसके मूल में वेद, पुराण और उपनिषद् की मूल भावना है। कलानाथ जी इस प्रसंग की किंचित् विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. योगेन्द्र सिंह भारतीय परम्पराओं के जिस आधुनिकीकरण की बात करते हैं, उसकी सहधर्मिता इस प्रसंग में देखी जा सकती है। लेखक समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में भारतीयता की तलाश करते हैं और इस क्रम में आधुनिकतावाद की कुप्रवृत्तियों से निजात की छटपटाहट स्पष्ट देखी जा सकती है; पर इस संदर्भ में वे भारत-व्याकुल नहीं है।कलानाथ मिश्र साहित्य के विविध परिप्रेक्ष्य पर विचार करते हुए शिविरबद्ध आलोचना की जड़ता और संवादहीनता को तोड़ते हैं। वे एक ओर प्रखर वामपंथी नागार्जुन की प्रातरोध चेतना को रेखांकित करते हैं तो दूसरी ओर समाज साहित्य और धर्म के संश्लेषण की व्याख्या करते हैं।
